सीता देवी- मधुबनी की संरक्षक

किसी समय में जब अंग्रेजी शासन का प्रभुत्व था, सीता देवी जैसे कलाकार ने न सिर्फ अद्भुत भारतीय कला को जीवित रखा बल्कि वैश्विक पहचान दी।


सीता देवी(१९१३-१००५)का जन्म सुपौल जिले के वसहा गांव में हुआ था और महज १२ वर्ष के उम्र में ही विवाह जीतवारपुर गांव के महापात्रा ब्राह्मण प्रांत में हो गया।

विवाह के बाद सीता देवी, जिनका जन्म एक संपन्न परिवार में हुआ था,को गरीबी और बहुत दुखों का सामना करना पड़ा। कुपोषण के कारण कई संतान की असामयिक मृत्यु हो गई और कदाचित यही संताप का प्रभाव था कि सीता देवी इश्वर की भक्ति में रम गईं।बाद के तीनों पुत्र जिवीत रहे, किसी चमत्कार से कम नहीं।


सन् १९६२ में भीषण आकाल के दौरान बचाव के उपाय के रूप में भारतीय सरकार के अंतर्गत हैंडक्राफ्ट कमिटी ने विख्यात डिजाइनर भारत कुलकर्णी को ग्रामीण क्षेत्रों में कला को प्रोत्साहन तथा व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए नियुक्त किया गया था।

उस समय महिलाओं को पारंपरिक ढंग छोड़कर कागज में चित्र उकेरने के लिए प्रेरित करना निश्चित ही बेहद कठिन कार्य रहा होगा पर कुलकर्णी जी भी इरादे के पक्के थे।



उसी दौरान कुलकर्णी जी को सीता देवी के अचुक हुनर और दरिद्रता की स्थिति का मालूम पङा

शुरुआत में सीता देवी थोङा झिचकी लेकिन फिर

धरोहर में मिले मधुबनी को उन्होंने कागज में उतारना प्रारंभ कर दिया जो आज कला के क्षेत्र का कोहिनूर है।


बाद में कई प्रदर्शनी में सीता देवी के चित्रों को प्रदर्शित किया गया। राष्ट्रीय पुरस्कार, पद्मश्री और भारत रत्न से सम्मानित सीता देवी अपने आखिरी दिनों तक कला के लिए तत्पर थीं।

सीता देवी उन कुछ चुनिंदा प्रचलित कलाकारों में से हैं जिन्होंने पारंपरिक रूप से दिवार को अलंकृत करने वाले कला को कागज तथा कैनवास में उतारकर नया स्तर प्रदान किया।

उनका यह कदम गौरवान्वित करने वाले मैथिली कला तथा भारत की अटुट परंपरा का बेहतरीन मिसाल बन कर उभरा।

खासतौर पर प्रखर रेखाओं के भीतर चटख रंगों से सुसज्जित किए गए 'भरनी' कला को सीता देवी के कारण ही ख्याति प्राप्त हुई।

सीता देवी भी मुख्य रूप से भरनी कला के लिए जानी जाती हैं।

अपने चित्रों में नारंगी, पीले और बैंगनी रंगों का अधिक तथा गुलाबी और लाल का अल्प प्रयोग चित्रों को कई गुना ज्यादा प्रभावशाली और मंत्रमुग्ध करने वाला बनाता था।



राधा कृष्ण और अन्य देवी देवताओं की आकृति उनके चित्रों में अकसर देखने को मिल जाती थी।

मिथिला की यह दुसरी सीता अद्भुत कला के साथ ढृढ़ संकल्प , लग्न,उदार भाव के लिए भी प्रसिद्ध है। प्रसिद्धि और शोहरत हासिल कर लेने के बाद भी अपने गाँव जीतवारपुर के कल्याण का काम करती रही जिसका प्रमाण है कि आज जितवारपुर में लोग समृद्धि से जीवन यापन कर रहे हैं।



सीता देवी वह सुर्य है जिसके प्रकाश से उनके स्वर्गवास होने के पश्चात भी कला के सभी उपासकों को निरंतर प्रेरणा मिल रहा है।





इरादे से पक्की रही सीता देवी ने बहुतेरों को, खासतौर पर महिलाओं को मधुबनी कला में दक्ष किया। महिला सशक्तिकरण की बेमिसाल उदाहरण, सीता देवी की अमृत कला सदैव सबके मन को प्रसन्नता के रंगों से भरती रहेंगी।

















Author: Tanya Saraswati Editor: Rachita Biswas


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